This Blog is for YOU...

If you are/were Gender Dysphoric - so as to know some from me and share some with me, and reaffirm that none of us is alone... To acknowledge that we have a treasure of insurmountable Courage, Strength and Hope in us. I have a feeling that we were given slightly higher quantities of those special gifts :-) [If you have a question to ask me, you could write it as a Comment to one of the posts, and either I would reply to it as a Comment itself, or probably, respond in one of the future posts on this blog]

If you have never been Gender Dysphoric - so as to understand what it means to have a Gender Identity Disorder. Of course, it primarily depends on whether you want to or not. If you don't, please do make a quiet exit and try not to be a nuisance.

If you're confused - so as to realize that everybody goes through a stage of confusion - the period could be short, or sometimes, very long. What is important is to acknowledge that being unsure until you're sure is as normal and as alright as night before day.

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If you're a human being - so as to find out for yourself whether you want to try to make the world a better place to live in, for every fellow human being, irrespective of their health, wealth, colour, race, gender, religion and any and every other line of division you can think of.

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And finally, this blog is for ME - so as to be able to make some difference somewhere by sharing my experiences, and along the way, slowly grow out of those anxieties and insecurities that have inhabited my life for over 2 decades. It is time to escort them to the door now!

Come, Join me on this journey!

Tuesday, September 30, 2008

Salaam, Zindagi!

सलाम, जिंदगी!

बात है बरसों पहले की
घने घिरे अन्धियाले की
धुंदली सी दो आँखों की
कटे हुए से पंखों की

नन्ही सी उन आंखों ने
जब झाँका बाहर परदे से
सुंदर तो वो दुनिया थी
पर अलग थी दुनिया अन्दर की

परदे की सिलवट से देखा
जग भर का रंगीन तमाशा
दिल ने की रंगों से यारी
आँखें पर बेरंग रहीं

धूप छाँव में चलती रहती
कैसे सब की जीवन गाड़ी,
बरसों तक न समझ सकी
क्यूँ उसकी ही दुनिया रुकी रुकी

रुके हुए से चलते चलते
जाना उसने हलके हलके
शीशे में जो परछाई थी
वो तो और किसी की थी

इक किरदार को हर पल जीना
खाली भले हो ख़ुद का सीना
पढ़ न ले कोई आँखें उसकी
पढ़ ले काश… कोई आँखें उसकी

धीरे धीरे भूल गई वो
अपनी ही पहचान कहीं तो
चीख ही बस इक याद रही
जो कभी किसी को नहीं सुनी

गहरे काले बादल की
बारिश में थी वो ठिठुर रही
जब आसमान पे नज़र पड़ी
उडी इक चिडिया उडी उडी!

देख के चिडिया याद हो आया
भूला हुआ वो अपना साया
पंखों की वो अपनी जोड़ी
जिससे रखी हर दम दूरी

बाँधा था ख़ुद को ही उसने
यारी की थी जंजीरों से
आशा की... पर हिम्मत न की
खूनी थी वो ख़ुद की ख़ुद ही

आँखों के वो धुन्दले परदे
चाहे तो वो पीछे कर दे
इन्द्रधनुष को छूने की
इच्छा है उसको और हक भी

बरसों बीत गए तो क्या है
बरसों अब भी बाकी तो हैं
बरसों की मेहनत है बाकी
और बरसों की खुशियाँ भी

बरसों बरसों करते करते
जीते जीते मरते मरते
हँसते रोते डरते डरते
फिर भी जुर्रत करते करते
राह है पकड़ी मंजिल की
थामे बाजू इस दिल की
बात नहीं ये बरसों की
बात नहीं कल परसों की
बात है अब ये इस पल की
बात है अब ये हर पल की
हर पल के उजियालों की
हर दिन के रौनक मेलों की
ख़ुद से हाथ मिलाने की
एक नया परिचय करवाने की

सलाम… सलाम… सलाम, जिंदगी!

4 comments:

  1. Amazing!!!!

    Just... absolutely adorable... :)

    take Care,

    God Bless!!!

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  2. Known Stranger - Thanks! :-)

    God Bless you too! All the Best!

    ReplyDelete
  3. aap ki is kavita me dil ki sachhai h,
    zindagi ki gahrai h,
    or jo himmat aapne sabki bandhai h.....


    uske liye

    salam Gazal
    salam Gajal
    salam Gazal......


    --Anuj

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Civility check done? :-)